नई दिल्ली। वर्ष 2023 में केंद्र सरकार द्वारा पारित किया गया “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” देश की राजनीति में ऐतिहासिक कदम माना गया। इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। संसद के दोनों सदनों में भारी बहुमत से यह बिल पास हुआ, लेकिन इसके लागू होने को लेकर एक बड़ी शर्त जोड़ दी गई—पहले नई जनगणना होगी, फिर परिसीमन (Delimitation) होगा और उसके बाद ही महिला आरक्षण लागू किया जाएगा। यही शर्त अब देश में सबसे बड़ी राजनीतिक बहस बन चुकी है।

आखिर सरकार ने जनगणना और परिसीमन को क्यों जोड़ा?
केंद्र सरकार का तर्क है कि महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण तय करने से पहले देश की आबादी के आधार पर संसदीय क्षेत्रों का नया निर्धारण जरूरी है। सरकार का कहना है कि परिसीमन के बाद सीटों की संख्या और सीमाएं बदल सकती हैं, इसलिए उसी के आधार पर महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें तय करना अधिक “पारदर्शी और न्यायसंगत” होगा।
हालांकि विपक्ष और कई संवैधानिक विशेषज्ञ इस दलील पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि वर्तमान 543 लोकसभा सीटों के ढांचे में भी महिला आरक्षण तुरंत लागू किया जा सकता था। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने जानबूझकर इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़कर लागू होने में वर्षों की देरी का रास्ता बनाया।
मोदी सरकार को इससे क्या राजनीतिक फायदा हो सकता है?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस रणनीति से केंद्र सरकार को कई संभावित फायदे मिल सकते हैं:
1. महिलाओं के बड़े वोट बैंक पर पकड़
महिला आरक्षण बिल को पास कराकर सरकार ने महिलाओं के बीच बड़ा राजनीतिक संदेश दिया कि वह महिला सशक्तिकरण के पक्ष में है। इससे महिला मतदाताओं में सकारात्मक छवि बनाने में मदद मिल सकती है।
2. लागू करने की जिम्मेदारी भविष्य पर डालना
क्योंकि बिल का लागू होना जनगणना और परिसीमन पर निर्भर कर दिया गया है, इसलिए सरकार तत्काल परिणाम देने के दबाव से बच जाती है। यदि प्रक्रिया लंबी चलती है तो सरकार कह सकती है कि संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है।
3. परिसीमन के जरिए राजनीतिक समीकरण बदलने की संभावना
परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों का बंटवारा आबादी के आधार पर बदलेगा। इससे उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों: जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीटें बढ़ सकती हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इससे राष्ट्रीय राजनीति का शक्ति संतुलन बदल सकता है।
परिसीमन क्या है और यह इतना विवादित क्यों है?
परिसीमन का मतलब है जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण। भारत में आखिरी बड़ा परिसीमन 2002 में हुआ था, लेकिन सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर रखी गई थी। यह रोक 2026 तक लागू है।
देशहित में परिसीमन कितना जोखिम भरा हो सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार परिसीमन कई गंभीर राजनीतिक और संघीय चुनौतियां पैदा कर सकता है।
1. दक्षिण भारत बनाम उत्तर भारत का टकराव
दक्षिण भारत के राज्यों—तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश—ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। यदि सीटों का निर्धारण केवल आबादी के आधार पर हुआ तो इन राज्यों की लोकसभा सीटें कम हो सकती हैं, जबकि उत्तर भारत के राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं। इससे दक्षिणी राज्यों में यह भावना मजबूत हो सकती है कि जनसंख्या नियंत्रण का “दंड” उन्हें मिल रहा है।
2. संघीय ढांचे पर असर
यदि कुछ राज्यों की राजनीतिक ताकत संसद में बहुत अधिक बढ़ जाती है तो राष्ट्रीय नीतियों में क्षेत्रीय संतुलन बिगड़ सकता है। इससे संघीय व्यवस्था पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
3. राजनीतिक ध्रुवीकरण
परिसीमन के बाद नए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलेंगी। विपक्षी दलों का आरोप है कि इसका इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए भी किया जा सकता है। कुछ नेताओं ने आशंका जताई है कि सीमाओं के पुनर्निर्धारण से चुनावी समीकरण बदले जा सकते हैं।
4. महिलाओं का आरक्षण फिर टलने का खतरा
यदि जनगणना और परिसीमन में देरी होती है, तो महिला आरक्षण का लागू होना भी वर्षों तक टल सकता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह आरक्षण 2029 या उससे भी बाद में लागू हो सकता है।
विपक्ष का क्या कहना है?
विपक्ष का कहना है कि सरकार चाहती तो मौजूदा सीटों के भीतर ही महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण दे सकती थी। कई विपक्षी नेताओं ने संसद में कहा था कि जनगणना और परिसीमन को इससे जोड़ना जरूरी नहीं है।
बड़ा सवाल
देश में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या महिला आरक्षण वास्तव में महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी देने का ऐतिहासिक कदम बनेगा, या फिर यह जनगणना और परिसीमन की लंबी प्रक्रिया में फंसकर राजनीतिक बहस का मुद्दा बनकर रह जाएगा। आने वाले वर्षों में जनगणना, परिसीमन और महिला आरक्षण तीनों मिलकर भारत की राजनीति का नया नक्शा तय कर सकते हैं।







