मनरेगा माफियाओं की करतूत! बाहा उड़ाही हुई तो मिट्टी कहां गई? लखनीपुर महेशपट्टी की योजना पर उठे गंभीर सवाल! जवाबदेह कौन ? पीओ महेश कुमार या रोजगार सेवक संजीव गिरी ?

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समस्तीपुर। उजियारपुर प्रखंड के लखनीपुर महेशपट्टी पंचायत में मनरेगा के तहत संचालित बाहा उड़ाही योजना को लेकर कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं। योजना के क्रियान्वयन को लेकर लगातार सामने आ रहे आरोपों के बीच अब सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि, यदि बाहा की उड़ाही वास्तव में की गई है तो निकाली गई मिट्टी आखिर गई कहां?

आपको बता दें कि, दिनेश राय के घर के नजदीक से जमुआरी नदी तक बाहा उड़ाही निर्माण योजना के अभिलेखों में बड़ी मात्रा में मिट्टी की खुदाई और उड़ाही दर्शाई गई है, लेकिन स्थल पर ऐसी कोई स्थिति दिखाई नहीं देती है, जिससे बड़े पैमाने पर मिट्टी निकाले जाने की पुष्टि हो सके। इस बीच सवाल यह पैदा लेता है कि, यदि लाखों रुपये खर्च कर बाहा की उड़ाही की गई है तो, बाहा उड़ाही से निकाली गई मिट्टी का उपयोग कहां किया गया है, इसका स्पष्ट जवाब किसी के पास नही है।

ग्रामीणों के बीच तो यह भी चर्चा है कि, कहीं बाहा उड़ाही के नाम पर केवल झाड़-झंखाड़ और घास की सफाई कर कार्य पूरा दिखाने का प्रयास तो नहीं किया गया ?  लोगों का कहना है कि कई स्थानों पर केवल सतही सफाई दिखाई देती है, जबकि वास्तविक उड़ाही कार्य का अपेक्षित प्रभाव कहीं नजर नहीं आ रहा है।

मनरेगा से जुड़े अधिकारियों को चाहिए कि, योजना की तकनीकी जांच कर यह स्पष्ट किया जाए कि, कितनी मिट्टी निकाली गई, उसे कहां डंप किया गया अथवा किस विकास कार्य में बाहा उड़ाही से निकाली गयी मिट्टी का उपयोग किया गया ? साथ ही योजना से संबंधित मापी पुस्तिका (एमबी), प्राक्कलन, जीओ-टैग फोटो, मस्टर रोल तथा भुगतान विवरण की भी जांच होनी चाहिए।

ग्रामीणों ने पंचायत रोजगार सेवक संजीव कुमार गिरी एवं उजियारपुर के कार्यक्रम पदाधिकारी महेश कुमार की कार्यशैली पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि, विकास योजनाओं के नाम पर पंचायत में पारदर्शिता की अनदेखी की गई है। उनका कहना है कि यदि योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वयन हुआ होता तो धरातल पर उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता।

ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत में कई विकास योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन शिकायतों के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होने से लोगों का भरोसा कमजोर पड़ रहा है। अब ग्रामीण पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं ताकि यह पता चल सके कि सरकारी राशि का उपयोग नियमानुसार हुआ है या नहीं।

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