मिशन त्रेतायुग’ की ओर बढ़ते कदम: अंगूठा चालू, बैलगाड़ी ऑन ट्रैक, बस ‘हांडी’ और ‘खड़ाऊ’ का इंतजार!

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विशेष ब्यूरो:[पाषाण काल समाचार] देश में ‘विकास’ की एक ऐसी अनोखी और उल्टी गंगा बही है कि, वैज्ञानिक भी सिर पकड़कर बैठ गए हैं। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा देशवासियों से की गयी अपील के बाद, समस्तीपुर के लोगों ने आधुनिकता के भूत को भगाने के लिए कमर कस ली है, और एक के बाद एक आत्मनिर्भरता के ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए जा रहे हैं, जिन्हें देखकर पूर्वज भी स्वर्ग से मुस्कुरा रहे होंगे।

डिजिटल इंडिया से ‘अंगूठा छाप इंडिया’ का सफर:

महंगाई और कागजी झंझटों से तंग आकर जनता ने अब कलम-स्याही और पेन ड्राइव को अलविदा कह दिया है। अब हर जगह ‘अंगूठा’ लगाने का चलन वापस आ गया है। न दस्तखत बदलने का डर, न बैंकों में साइन मिसमैच होने का झंझट। अंगूठा जिंदाबाद!

गैस मुक्त रसोई, पानी वाली सब्जी:

सिलेंडर की कीमतों ने जब से आसमान छूकर बादलों को चूमा है, तब से गृहिणियों ने गैस चूल्हे को म्यूजियम में रखवा दिया है। अब घर-घर में लकड़ी और उपलों की भीनी-भीनी खुशबू महक रही है। रही बात सरसों तेल की, तो मोदी जी की ‘कम तेल खाओ’ वाली सलाह को जनता ने इतना सीरियसली लिया कि, अब सीधे पानी में ही सब्जी उबाली जा रही है। जीरो कोलेस्ट्रॉल, शत-प्रतिशत बचत!

बुलेट छोड़ो, बैलगाड़ी पकड़ो:

पेट्रोल के दाम ‘शतक’ मारकर अब दोहरा शतक बनाने की राह पर हैं, इसलिए समझदार नागरिकों ने मोटरसाइकिल और कारें कबाड़ में बेच दी हैं। सड़कों पर अब ठाट से बैलगाड़ियां और साइकिलें दौड़ रही हैं। न चालान का डर, न इंश्योरेंस का खर्चा, और प्रदूषण तो ऐसा गायब हुआ है कि सीधे सतयुग का अहसास हो रहा है।

लेकिन कुछ काम अभी अधूरे हैं:

पुरातन संस्कृति के विशेषज्ञों का कहना है कि हम ‘सच्चे विकास’ के बेहद करीब हैं, बस कुछ अंतिम चरण (Final Steps) पूरे होने बाकी हैं: चौकी-खाट का परित्याग: जैसे ही सामने से कोई ‘सामंती ताकत’ या इलाके के रसूखदार महाशय गुजरें, जनता को तुरंत कुर्सी-खाट छोड़कर हाथ जोड़े, रीढ़ की हड्डी को 90 डिग्री पर झुकाकर खड़े हो जाना चाहिए। अभी कुछ लोग गलती से बैठ जाते हैं, जिससे प्राचीन परंपरा आहत हो रही है। चरण-पादुका निषेध: सड़कों की कंक्रीट को पैरों से महसूस करने के लिए जरूरी है कि जूते-चप्पल का पूरी तरह बहिष्कार किया जाए। गले में हांडी और पीछे झाड़ू:  वह ऐतिहासिक और गौरवशाली दौर बस आने ही वाला है, जब स्वच्छता अभियान को अगले लेवल पर ले जाते हुए गले में हांडी लटकाकर बाहर निकलने और सड़क पर अपने पैरों के निशान मिटाने की रस्म दोबारा शुरू होगी। विशेषज्ञ की राय: “जिस रफ्तार से हम पीछे की ओर बढ़ रहे हैं, वह दिन दूर नहीं जब हम सब मिलकर सीधे आदिमानव काल में प्रवेश कर जाएंगे। तब न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। न रहेगा पैसा, न होगी महंगाई!”

नोट: अगली बार जब आप पानी में उबली सब्जी खाएं, तो खुद को आधुनिक नहीं, बल्कि ‘संस्कारी और पारंपरिक’ समझकर गर्व का अनुभव करें।

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