उजियारपुर मनरेगा में, PO JE PRS व पंचायत जन-प्रतिनिधियों ने मचा रखी है लूट! रिश्वत के बल पर उजियारपुर में फर्जी योजनाओं की बाढ़! पंचायत के एक शराबी जनप्रतिनिधि के यहां रोज सजती है महफिलें।

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समस्तीपुर। उजियारपुर प्रखंड के लखनीपुर महेशपट्टी पंचायत में, मनरेगा योजनाओं के संचालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। पंचायत में विकास कार्यों के नाम पर फर्जी योजनाओं का संचालन, कमीशनखोरी तथा जांच के बाद भी कार्रवाई नहीं होने के आरोपों ने, स्थानीय स्तर पर नई बहस छेड़ दी है। ग्रामीणों और सूत्रों के अनुसार पंचायत में संचालित कई योजनाओं में अनियमितता बरती गई है, जिसकी शिकायत विभागीय अधिकारियों तक भी पहुंचाई गई थी।

सूत्रों के अनुसार पंचायत में मनरेगा के तहत संचालित विभिन्न विकास योजनाओं में, वास्तविक कार्य की तुलना में कागजी प्रगति अधिक दिखाई गई।  हालत ऐसे हैं कि, कुछ योजनाएं धरातल पर पूरी तरह दिखती भी नही है, जबकि उनका प्रशासनिक और वित्तीय रिकॉर्ड तैयार कर भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई है। इस पूरे मामले में कार्यक्रम पदाधिकारी (मनरेगा) महेश कुमार, संबंधित तकनीकी सहायक/इंजीनियर सचिन कुमार तथा पंचायत रोजगार सेवक संजीव गिड़ी की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि मनरेगा योजनाओं के स्वीकृति, मापी, एमबी बुक संधारण, जियो टैगिंग, एफटीओ  प्रक्रिया तथा भुगतान स्वीकृति के दौरान कई स्तरों पर नियमों की अनदेखी की गई है। सूत्रों का यह भी कहना है कि कुछ योजनाओं में कार्य स्थल पर अपेक्षित मजदूर नहीं मिले, जबकि मस्टर रोल में मजदूरों की संख्या सैकड़ों में दर्ज की गई है। वहीं कुछ योजनाओं में भौतिक प्रगति और ऑनलाइन एमआईएस में दर्ज प्रगति के बीच अंतर होने की भी चर्चा है।

मामले को लेकर पंचायत के ही एक युवक द्वारा विभागीय अधिकारियों को लिखित शिकायत दिए जाने की बात सामने आ रही है। शिकायत के बाद प्रखंड स्तर पर जांच भी कराई गई। सूत्रों का दावा है कि जांच के दौरान लगभग 10 से 12 योजनाओं में अनियमितता के संकेत मिले थे और संबंधित योजनाओं को रद्द करने की बात भी कही गई थी। हालांकि बाद में उन योजनाओं के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ गई है।

सबसे गंभीर आरोप यह लगाया जा रहा है कि जांच के बाद मामले को दबाने के लिए कथित रूप से रिश्वत का लेन-देन हुआ है। सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि पंचायत के एक जनप्रतिनिधि के ऑरिजनल पति ने कथित तौर पर एक लाख रुपये की राशि पहुंचाई गई, जिसके बाद पहले संदिग्ध मानी जा रही योजनाओं को सही बताते हुए भुगतान प्रक्रिया आगे बढ़ा दी गई। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

मनरेगा के जानकारों का कहना है कि यदि किसी योजना में फर्जीवाड़ा या अनियमितता पाई जाती है तो विभागीय नियमों के अनुसार योजना को रोकने, तकनीकी जांच कराने, भुगतान पर रोक लगाने तथा दोषी पाए जाने पर राशि की वसूली और कार्रवाई का प्रावधान है। ऐसे में यदि शिकायत और जांच के बावजूद भुगतान जारी हुआ है तो, इसकी उच्चस्तरीय जांच आवश्यक हो सकती है।

ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, उप विकास आयुक्त (डीडीसी) तथा मनरेगा के जिला कार्यक्रम समन्वयक से पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि पंचायत में संचालित सभी योजनाओं का भौतिक सत्यापन, जियो टैगिंग रिकॉर्ड, मस्टर रोल, माप पुस्तिका (एमबी), तकनीकी स्वीकृति तथा भुगतान से संबंधित दस्तावेजों की जांच कराई जाए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

नोट: समाचार में उल्लिखित रिश्वत, कमीशनखोरी और फर्जीवाड़े से जुड़े आरोप स्थानीय सूत्रों एवं शिकायतकर्ताओं के दावों पर आधारित हैं। संबंधित अधिकारियों एवं आरोपित पक्ष का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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