उजियारपुर में मनरेगा योजना में कैसे मचाई जाती है लूट? जानिए फर्जीवाड़े के आम तरीके और तकनीकी खेल

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समस्तीपुर। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने और विकास कार्यों को गति देने के उद्देश्य से संचालित, मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) देश की सबसे बड़ी रोजगार योजनाओं में से एक है, लेकिन यही योजना उजियारपुर में पीओ, जेई व पंचायत रोजगार सेवक के कारण अनियमितता और भ्रष्टाचार का जनक बन गया है। उजियारपुर मनरेगा कार्यालय में चतुर्थवर्गीय कर्मचारी के पद पर तैनात अजब लाल राय इस पुरे प्रखंड में होने वाले भ्रष्टाचार की देखरेख करता है। कहां ? किससे ? कितना और कब रिश्वत लेना है, सभी काम यह अजबलाल राय ही देखता है। सरकारी नियमों के अनुसार मनरेगा में हर कार्य की ऑनलाइन निगरानी, जियो टैगिंग, मास्टर रोल और बैंक खाते के माध्यम से भुगतान की व्यवस्था है, बाबजूद कुछ भ्रष्ट अधिकारी, कर्मचारी और बिचौलिए तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर सरकारी राशि की बंदरबांट कर लेते हैं।

फर्जी योजना बनाकर राशि की निकासी

मनरेगा में किसी भी कार्य के लिए प्रशासनिक स्वीकृति और तकनीकी स्वीकृति आवश्यक होती है, लेकिन उजियारपुर में मनरेगा कर्मियों के द्वारा ज्यादातर पंचायतों में कागजों पर ही योजना स्वीकृत कराकर कार्य संपन्न दिखा दिया जाता है, जबकि धरातल पर काम नहीं होता। बाद में फर्जी मापी और रिपोर्ट के आधार पर भुगतान भी करा लिया जाता है।

फर्जी मस्टर रोल का खेल

मनरेगा कार्यों में मनरेगा कर्मियों के द्वारा सैकड़ों की संख्या में मजदूरों की उपस्थिति बना दी जाती है, और उसी के आधार पर मस्टर रोल भी बना दिया जाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि, मजदूरों की कोई उपस्थिति ही नही होती है। पुर्व से ली गयी तस्वीर को ही फर्जी कार्यस्थल पर पहुंचकर विभागीय बेवसाइट पर अपलोड कर दिया जाता है। कभी-कभी तो मजदूरों के जगह ऐसे लोगों का नाम भी दर्ज कर दिए जाते हैं, जो किसी अन्य प्रदेश में रहकर मजदूरी करते हैं।

जियो टैगिंग और फोटो में हेराफेरी

आजकल अधिकांश योजनाओं की जियो टैगिंग और कार्यस्थल की तस्वीरें अपलोड करनी होती हैं, लेकिन इसमें भी काफी बड़ा घोटाला किया जाता है। उजियारपुर मनरेगा कार्यालय से जुड़े कर्मी एक ही कार्य की तस्वीर को अलग-अलग योजनाओं में उपयोग कर विभागीय बेबसाइट पर अपलोड कर दिया जाता है, या किसी दूसरे स्थान की तस्वीर लगाकर कार्य पूरा दिखा दिया जाता है।

माप पुस्तिका में गड़बड़ी

तकनीकी सहायक या जूनियर इंजीनियर द्वारा कार्य की मापी की जाती है। इसी के आधार पर भुगतान स्वीकृत होता है, लेकिन यहां भी यह कर्मी शातिर दिमाग लगाते हुए वास्तविक कार्य कम और नही होने के बावजूद भी है, एमबी में अधिक मात्रा दर्ज कर दी जाती है। अर्थात अगर किसी पंचायत में 100 मीटर ही मिट्टीकरण का काम किया गया है तो, उसके स्थान पर 1000  मीटर दर्शा दिया जाता है।

सामग्री और मजदूरी में फर्जी बिल

मनरेगा के कुछ योजनाओं में सामग्री की खरीद भी की जाती है, लेकिन इस तरह के मामलों में भी मनरेगा माफिया बाजार मूल्य से अधिक दर पर सामग्री खरीद दिखाकर अतिरिक्त राशि की निकासी कर लेते हैं। इसके लिए मनरेगा माफिया अपनी पूंजी से अपने रिश्तेदार, जान-पहचान वाले या अपने परिवार के लोगों के नाम पर ही मान्यता प्राप्त दुकान खोलबा लेते हैं। हालांकि ज्यादातर मामलों में ऐसा देखा गया है कि, बिना सामग्री खरीद ही बिल लगा दिए जाते हैं। ऐसे दुकानदार के यहां कुछ भी सामान नही रहता है। बस केवल दिखाने के उद्देश्य से थोड़ा-बहुत सामान दुकान में रखा रहता है।

एफटीओ के जरिए भुगतान

मनरेगा में भुगतान की अंतिम प्रक्रिया एफटीओ कहलाती है। तकनीकी और प्रशासनिक स्वीकृति के बाद एफटीओ जनरेट होता है, और राशि सीधे बैंक खाते में जाती है। यदि शुरुआती स्तर पर रिकॉर्ड में गड़बड़ी कर दी जाए तो, भुगतान प्रक्रिया भी पूरी हो जाती है और बाद में अनियमितता पकड़ना कठिन हो जाता है।

कमीशनखोरी का आरोप

ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर यह सुनने को मिलता है कि योजना स्वीकृति, मापी, जियो टैगिंग, भुगतान या जांच रिपोर्ट को प्रभावित करने के लिए कमीशन लिया जाता है। हालांकि ऐसे मामलों में अभी तक कार्रवाई  भी बड़ी तेजी से होता है, लेकिन यह तभी संभव होती है जब पर्याप्त साक्ष्य और जांच रिपोर्ट उपलब्ध हो।

जांच के दौरान अपनाए जाने वाले तरीके

जब शिकायत होती है तो जांच अधिकारी आमतौर पर जांच पदाधिकारी योजना स्थल का भौतिक सत्यापन, जियो टैगिंग रिकॉर्ड, मस्टर रोल, एमबी, मजदूरों के बैंक खाते में भुगतान, कार्य स्थल की तस्वीरें, तकनीकी स्वीकृति एवं प्रशासनिक स्वीकृति, ऑनलाइन एमआईएस रिकॉर्ड की जांच करते हैं।
इस दौरान यदि किसी योजना की ऑनलाइन प्रगति और वास्तविक स्थिति में अंतर पाया जाता है, मजदूरों से पूछताछ में गड़बड़ी सामने आती है, या जियो टैगिंग रिकॉर्ड संदिग्ध मिलता है तो, जांच एजेंसियां भुगतान रोक सकती हैं। दोषी पाए जाने पर राशि की वसूली, निलंबन, विभागीय कार्रवाई और एफआईआर तक दर्ज की जा सकती है। आपको बता दें कि, मनरेगा ग्रामीण विकास और रोजगार का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन जहां पारदर्शिता और निगरानी कमजोर पड़ती है, वहां अनियमितताओं की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए योजनाओं की नियमित जांच, सामाजिक अंकेक्षण, ऑनलाइन निगरानी और ग्रामीणों की जागरूकता ही भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।

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