समस्तीपुर। एक ओर बिहार सरकार एवं जिला प्रशासन भीषण गर्मी और हीट वेव को देखते हुए लोगों को अनावश्यक रूप से घरों से बाहर नहीं निकलने की सलाह दे रही है, वहीं दूसरी ओर उजियारपुर प्रखंड में मनरेगा योजनाओं के तहत बड़ी संख्या में मजदूरों से कार्य कराए जाने को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। सरकारी पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रखंड की विभिन्न पंचायतों में सैकड़ों मजदूर इस भीषण गर्मी में कार्यरत दिखाए जा रहे हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार बैकुंठपुर ब्रह्मंडा पंचायत में 29, बेलामेघ में 207, बेलारी में 64, भगवानपुर कमला में 187, भगवानपुर देसुआ में 126, बिरनामातुला में 88, चैता उत्तरी में 55, चांदचौर करिहारा में 76, चांदचौर पूर्वी में 30, चांदचौर पश्चिमी में 352, हरपुर रेवाड़ी में 238, लखनीपुर महेशपट्टी में 276, लोहागीर में 311, महिसारी में 87, मालती में 28, नाजिरपुर में 704, निकसपुर में 20, परोरिया में 191 तथा सातनपुर में 14 मजदूर कार्यरत दर्शाए गए हैं।
इन आंकड़ों के अनुसार केवल उक्त पंचायतों में ही करीब तीन हजार से अधिक मजदूर मनरेगा कार्य में लगे हुए बताए जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब मौसम विभाग लगातार हीट वेव की चेतावनी जारी कर रहा है, और प्रशासन लोगों को धूप से बचने की सलाह दे रहा है, तब इन मजदूरों की सुरक्षा के लिए क्या विशेष प्रबंध किए गए हैं?
मनरेगा नियम क्या कहते हैं?
मनरेगा के संचालन संबंधी दिशा-निर्देशों के अनुसार कार्यस्थल पर मजदूरों के लिए कई बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना अनिवार्य है। इनमें स्वच्छ पेयजल, प्राथमिक उपचार (फर्स्ट एड) किट, छायादार विश्राम स्थल, आपातकालीन चिकित्सा सहायता तथा महिलाओं के लिए आवश्यक सुविधाएं शामिल हैं।
इसके अलावा भीषण गर्मी के दौरान श्रमिकों को लू (हीट स्ट्रोक) से बचाने के लिए कार्य अवधि में बदलाव, पर्याप्त विश्राम, पीने के पानी की उपलब्धता तथा स्वास्थ्य निगरानी जैसे उपाय किए जाने चाहिए। श्रम सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान और उच्च आर्द्रता की स्थिति में लंबे समय तक खुले मैदान में कार्य करना स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
सुरक्षा व्यवस्था पर उठ रहे सवाल
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिन पंचायतों में हजारों मजदूरों के कार्यरत होने का दावा किया जा रहा है, वहां अधिकांश कार्यस्थलों पर न तो पर्याप्त पेयजल की व्यवस्था दिखाई देती है और न ही विश्राम के लिए छायादार स्थल उपलब्ध हैं। कई स्थानों पर प्राथमिक उपचार की व्यवस्था भी नहीं होने की शिकायतें सामने आ रही हैं।
लोगों का कहना है कि यदि वास्तव में इतने बड़े पैमाने पर मजदूर कार्य कर रहे हैं तो प्रशासन को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि प्रत्येक कार्यस्थल पर मजदूरों की सुरक्षा के लिए कौन-कौन से इंतजाम किए गए हैं। वहीं यदि जमीनी स्तर पर मजदूरों की संख्या सरकारी अभिलेखों से मेल नहीं खाती है तो इसकी भी जांच आवश्यक है।
जांच की उठी मांग
ग्रामीणों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन, जिला कार्यक्रम समन्वयक (मनरेगा) तथा श्रम विभाग से मांग की है कि, सभी कार्यस्थलों का निरीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाए कि मजदूरों की सुरक्षा संबंधी सभी मानकों का पालन हो रहा है या नहीं। साथ ही सरकारी पोर्टल पर दर्ज मजदूरों की संख्या और वास्तविक उपस्थिति का सत्यापन भी कराया जाए।








